Friday, January 28, 2011

दवाओं को तोड़कर खाना है खतरनाक


शोधकर्ताओं का कहना है कि दवाओं को दो या ज्यादा हिस्सों में तोड़कर खाना बेहद खतरनाक हो सकता है। इससे दवा की गलत मात्रा शरीर में पुहंच सकती है।

' जर्नल ऑफ एडवांस्ड नर्सिंग' में प्रकाशित शोध पत्र के हवाले से समाचार पत्र 'डेली एक्सप्रेस' में प्रकाशित समाचार में कहा गया कि दवाओं को तोड़कर खाने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि दवा की गलत मात्रा लेने पर दवा और जहर में बारीक अंतर रह जाता है।

दवा की गोलियों को तोड़े जाने पर सामान्यत: यह गैर बराबर भागों में टूटती हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि तोड़कर ली जाने वाली 31 प्रतिशत गोलियों में दवा की मात्रा गलत होती है और इससे दवा की 15 से 25 प्रतिशत ज्यादा मात्रा शरीर में पहुंचने की आशंका रहती है।

इस अध्ययन में पार्किंसन, हार्ट अटैक और आर्थराइटिस (गठिया) जैसे रोगों के लिए दी जाने वाली दवाओं के संबंध में यह अध्ययन किया। अध्ययन में सिफारिश की गई है कि कंपनियों को दवाओं की विभिन्न मात्राओं वाली गोलियों का उत्पादन करना चाहिए।

2012 में बंद हो जाएंगे मोबाइल फोन?


एक्सपर्ट्स ने आशंका जताई है कि सूर्य की चुम्बकीय शक्ति के कारण 2012 में मोबाइल फोन, ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) और यहां तक राष्ट्रीय ग्रिड बंद हो जाएंगे।

समाचार पत्र 'डेली मेल' के मुताबिक विशेषज्ञों का मानना है कि नार्दर्न लाइट्स के कारण यह अनहोनी और अनचाही घटना हो सकती है।

इसका कारण यह है कि सूर्य के ध्रुव पर इसका चुम्बकीय क्षेत्र 50 सालों में सबसे शक्तिशाली होगा, जिसके कारण चुम्बकीय क्षेत्र नियमित से अधिक रफ्तार के कारण चलायमान होगा।

इस कारण सोलर विंड (सूर्य से निकलने वाला ताप) धरती के वातावरण से मिल जाएगा और अपने दायरे में आने वाली सभी चीजों को प्रभावित करेगा।

नासा के वैज्ञानिकों का मानना है कि 2000 के बाद एक बार फिर 2012 में 'सोलर मैक्सिमम' से इलेक्ट्रॉनिक गुड्स को खतरा है।

यह शक्ति 1958 के बाद सर्वाधिक तीव्र स्तर पर होगी। 1958 में इस शक्ति के कारण सर्वाधिक दिक्कत मैक्सिको के लोगों को उठानी पड़ी थी।

मोटापे, डायबीटीज का इलाज बस 15 मिनट में


वैज्ञानिकों ने ऐसा उपाय खोज निकाला है जिसके इस्तेमाल से मोटापा तो छूमंतर हो जाएगा, साथ ही डायबीटीज के शुरुआती लक्षण भी खत्म हो जाएंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि इलाज महज 15 मिनट का है और कोई ऑपरेशन नहीं करना होगा।

इसमें एंडोबैरियर नामक डिवाइस एंडोस्कोप इंस्ट्रूमेंट के जरिये छोटी आंत में डाली जाती है, जहां भोजन अवशोषित होता है। डिवाइस छोटी आंत और भोजन के बीच बाधा बन जाती है। डॉक्टरों का मानना है कि इससे छोटी आंत से निकलने वाले हार्मोनल संकेतों के ऐक्टिव होने का अंदाज बदल जाता है। वैसे, शरीर को पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिलते रहते हैं। इस डिवाइस को शरीर के अंदर डालने में पेशंट को बेहोश नहीं करना पड़ता। डिवाइस को शरीर में 18 महीनों तक रखा जा सकता है, लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि ज्यादातर मामलों में मकसद छह से नौ महीनों में पूरा हो जाता है। एंडोस्कोप से ही डिवाइस निकाले जाने के बाद मरीज डायट और एक्सर्साइज से वजन पर काबू रख सकते हैं।

यह अनोखा ट्रीटमेंट सर्जरी के सस्ते और सुरक्षित विकल्प के तौर पर उभरा है। नीदरलैंड्स में हुए 12 हफ्तों के ट्रायल में मरीजों ने औसतन 15.75 किलो वजन कम किया। 40 मरीजों ने 12 हफ्ते में 19 फीसदी वजन कम किया। दूसरी तरफ कंट्रोल ग्रुप के मरीजों ने डाइटिंग करके सिर्फ 5 किलो वजन कम किया। ट्रायल के दौरान देखा गया कि ऐसा करने से कुछ हफ्तों में ही टाइप टू डायबीटीज के मरीजों का ब्लड शुगर लेवल कम हो गया और उन्हें दवा लेने की जरूरत नहीं पड़ी। इस इलाज में 2000 डॉलर (करीब 92 हजार रुपये) खर्च होते हैं, जो मोटापा कम करने के सस्ते से सस्ते ऑपरेशन से भी आधा कम है। अमेरिका और यूरोप में काफी विस्तार से टेस्ट किए गए हैं। नई डिवाइस को पिछले हफ्ते यूरोपीय मरीजों पर इस्तेमाल के लिए पेटेंट दे दिया गया। एंडोबैरियर बनाने वाली अमेरिकी कंपनी का कहना है कि यूके में मरीजों के इलाज के लिए यह डिवाइस इस साल के अंत तक उपलब्ध हो जाएगी।

यूके में वेट लॉस सर्जरी के प्रमुख कंसल्टेंट नैडे हाकिम ने कहा है कि मुझे इस विधि से मरीजों का इलाज कर खुशी होगी। यह आइडिया नायाब है। यह तरीका मरीजों को भी अच्छा लगेगा, क्योंकि उन्होंने सर्जरी की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। हालांकि हम सर्जरी को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित बनाए रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन सर्जरी से बचा जा सके तो यह ज्यादा अच्छी बात होगी।

अमेरिका के नॉर्थ कैरलाइना में एक मेडिकल सेंटर के ओबेसिटी सर्जरी हेड डॉ. कीथ गरसिन का कहना है, मोटापे से जुड़ी सर्जरी रिस्की हो सकती है। खासतौर पर इसलिए कि मरीजों का वजन बहुत होता है और उन्हें हमें ऑपरेशन के दौरान बेहोश करना पड़ता है। इसलिए एक नॉन सर्जिकल तरीका होना बहुत फायदेमंद है। यह तरीका इतनी तेजी से काम करता है कि ढेर सारे मरीजों का इलाज किया जा सकता है। मरीजों ने इसे इतना पसंद किया कि वे ट्रायल खत्म होने के बाद भी इसे हटाना नहीं चाह रहे थे। इसके अलावा इसके साइड इफेक्ट नहीं हैं, साथ ही इसे आसानी से हटाया भी जा सकता है।

रोज कंप्यूटर को दिए 4 घंटे, तो दिल दे देगा 'धोखा'


कंप्यूटर पर ज्यादा काम करने लोग थोड़ा होशियार हो जाएं। एक नई स्टडी में दावा किया गया है हर रोज महज 4 घंटे कंप्यूटर या टीवी स्क्रीन के आगे बिताने वाले लोगों को दिल की बीमारी होने का खतरा दोगुना हो जाता है। ऐसे लोगों की समय से पहले मौत के आसार बढ़ जाते हैं।

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के रिसर्चरों ने इस बारे में एक स्टडी कर यह नतीजा निकाला है। उन्होंने पाया कि जो लोग रोजाना चार घंटे या इससे ज्यादा समय तक कंप्यूटर पर काम करते हैं या फिर टीवी देखते हैं , उन्हें उन लोगों के मुकाबले दिल की बड़ी बीमारियां होने और इसके नतीजतन मौत का खतरा 125 फीसदी ज्यादा होता है , जो दो घंटे या इससे कम समय टीवी या कंप्यूटर पर बिताते हैं। स्टडी में यह भी पाया गया है कि कंप्यूटर या टीवी स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने वाले लोगों की अन्य वजहों से भी मौत का खतरा 48 फीसदी बढ़ जाता है। रिसर्चरों का यह भी कहना है कि कंप्यूटर या टीवी से होने वाले इस नुकसान भी भरपाई एक्सरसाइज या वर्जिश करने से भी नहीं की जा सकती। यह स्टडी ' डेली एक्सप्रेस ' में छपी है।

रिसर्चरों के अनुसार इसकी वजह बेहद साफ है। ज्यादा समय तक निष्क्रिय रहने शरीर के अंदर सूजन और मेटाबॉलिक दिक्कतें होने लगती है। ज्यादा समय तक एक जगह बैठे रहने से एक बेहद अहम एंजाइम - लिपोप्रोटीन में 90 फीसदी तक कमी जाती है। वास्तव में , यह वही एंजाइम है जो शरीर में दिल की बीमारियों से बचाव करता है।

इस स्टडी की अगुवाई करने वाले यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट के डॉक्टर एमनुएल स्टामैटेकिस के मुताबिक हमारी स्टडी बताती है कि स्क्रीन पर दो घंटे या इससे ज्यादा समय बिताने से किसी शख्स में हार्ट से जुड़ी दिक्कत होने का खतरा बढ़ जाता है।

क्या करें ऐसे लोग
रिसर्चरों की सलाह है कि ऐसे लोग जो कंप्यूटर स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताते हैं , उन्हें खतरे को कम करने के लिए हरेक 20 मिनट के बाद उठकर थोड़ी दूर टहल लेना चाहिए। डॉ . एमनुएल का कहना है कि खडे़ होने और चलने से बैठे रहने के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा एनर्जी खर्च होती है और इस तरह से खतरे को कम किया जा सकता है। गौरतलब है कि भारत सहित दुनिया में टीवी और कंप्यूटर के साथ लोगों का समय अब ज्यादा गुजरने लगा है।

2012 तक दिख सकता है एक और सूरज, रातें भी बनेंगी दिन


साल 2012 तक ऐसा कुछ हो सकता है जिसकी कल्पना शायद आपने न की हो। हो सकता है, किसी दिन अचानक आपको दिन ज्यादा रोशन लगने लगे, रात को चांद के साथ सूरज भी चमकता दिखे, और तो और रोज सुबह सूरज देखकर दिन शुरू करने वाले या उसे जल चढ़ाने वाले भी आसमान में दो सूरज देखकर कनफ्यूज हो जाएं। ऐसा हो सकता है, अगर अब तक की सबसे बड़ी सनसनी, वैज्ञानिकों की यह भविष्यवाणी सही साबित हो गई।

ब्रिटिश अखबार डेली मेल के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया की सदर्न क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के सीनियर लेक्चरर ब्रैड कार्टर ने दावा किया है कि यूनिवर्स के सबसे चमकदार तारों में से एक बीटलगेस तारा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। यह जल्दी ही एक बड़े विस्फोट के बाद सुपरनोवा में तब्दील होकर खत्म हो जाएगा। इससे धरती पर रोशनी की बारिश होगी और इस शानदार लाइट वर्क से धरती पर रातें भी सूरज की रोशनी से नहाई होंगी। यह नजारा एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, बल्कि पूरे दो हफ्ते तक रह सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस तारे का विस्फोट इतना चमकदार होगा कि ओरियन नक्षत्रमंडल (कॉन्स्टिलेशन) में मौजूद यह तारा धरती से 640 लाइट इयर्स दूर होते हुए भी धरती पर रातों को दिन में बदल देगा। धरती से देखने पर ऐसा लगेगा कि आसमान में दो सूरज उग आए हैं। इस घटना के बारे में अब इकलौती बहस इस बात पर हो रही है कि यह नजारा कब देखने को मिलेगा।

डॉ. कार्टर के मुताबिक, यह ब्लास्ट साल 2012 से पहले भी हो सकता है। या फिर अगले दस लाख सालों में भी मुमकिन हो सकता है। एक ऑस्ट्रेलियाई वेबसाइट से बातचीत में कार्टर ने बताया कि बूढ़े हो चुके इस तारे के केंद्र में अब ईंधन खत्म हो रहा है। यही ईंधन के बल पर बीटलगेस चमक पाता है और जिंदा है। जब यह ईंधन खत्म हो जाएगा तो यह तुरंत अपने आप को खत्म कर देगा। इस दौरान हमें कुछ हफ्तों तक इससे बेतहाशा रोशनी आती दिखेगी पर उसके बाद कुछ महीनों में यह सब छंट जाएगा और इसे देख पाना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा।

बीटलगेस के कारण आसमान में दो सूरज दिखने की यह सनसनी इंटरनेट पर भी छा चुकी है। कई इसे प्रलय की थ्योरी से जोड़कर देख रहे हैं, तो कई 2012 के बारे में माया कैलंडर की भविष्यवाणियों से। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह घटना धरती से इतनी दूर होगी कि उससे हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचने वाला। डॉ. कार्टर का कहना है कि जब किसी स्टार में विस्फोट होता है, तब सबसे पहले हमें इससे न्यूट्रिनोस नाम के छोटे कणों की बारिश होती दिखाई देती है। बीटलगेस के मामले में भी न्यूट्रिनोस धरती पर बरसेंगे और इन्हीं में सुपरनोवा की 90 पर्सेंट एनर्जी बिखर जाएगी। पर इसका इंसानी शरीर पर या धरती पर कोई नुकसान नहीं होगा।

क्या है बीटलगेस
यह एक तारा है जिसे यूनिवर्स के सबसे बड़े चमकदार तारों में से एक माना जाता है। ऐसे तारों की लिस्ट में इसे नौवें नंबर पर माना जाता है। नारंगी-लाल रंग का दिखाई देने वाला यह तारा ओरियन कॉन्स्टिलेशन में है। यह धरती से 640 प्रकाश वर्ष दूर है। प्रकाश वर्ष का मतलब प्रकाश द्वारा एक साल में तय की गई दूरी से होता है।

मोबाइल ऑपरेटर बदलने के 10 फायदे-नुकसान


मोबाइल नंबर पॉर्टेबिलिटी (एमएनपी) लागू होने के साथ ही मोबाइल नंबर अब आपकी मुट्ठी में है। आप बिना नंबर बदले अपना मोबाइल ऑपरेटर बदल सकते हैं। एमएनपी के फायदे तो बेशुमार हैं ही, लेकिन इसकी कुछ बंदिशें और नुकसान भी हैं। आइए आपको बताते हैं इसके 10 फायदे-नुकसान...

1-मोबाइल ऑपरेटर बदलने का क्या नुकसान है?
मोबाइल ऑपरेटर बदलने के साथ ही आप प्रीपेड कार्ड का बैलेंस खो बैठेंगे। यदि आप सीडीएमए से जीएसएम में जाना चाहते हैं, तो आपको हैंडसेट भी बदलना होगा। 3

2-क्या टेक्नॉलजी में भी बदलाव संभव है?
GSM/CDMA दोनों तरह के ग्राहक एमएनपी का लाभ उठा सकते हैं। पोस्टपेड और प्रीपेड दोनों तरह के ग्राहक ऑपरेटर बदल सकते हैं।

3-कितने दिनों में बदल जाएगा ऑपरेटर?
कम से कम 7 दिन में यह प्रोसेस पूरा होगा। जम्मू-कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट में 15 दिन लेंगेगे।

4-कितना महंगा है ऑपरेटर बदलना?
मोबाइल ऑपरेटर को बदलने के लिए आपको 19 रुपये चुकाने होंगे। इसका भुगतान नए सर्विस प्रवाइडर को करना होगा।

5-दिल्ली का नंबर मुंबई में चलेगा?
नहीं। आप सर्कल नहीं बदल सकते हैं। इसका मतलब यह है कि नंबर दिल्ली का है तो मोबाइल ऑपरेटर दिल्ली में ही बदलना होगा, मुंबई में नहीं। ऑपरेटर को आप केवल सर्कल के अंदर ही बदल सकते हैं।

6-कितने अंतराल में बदल सकते हैं ऑपरेटर?
आपको मोबाइल ऑपरेटर बदलने के बाद कम से कम तीन महीने उसके साथ रहना होगा। आप 90 दिन बाद ही अपना सर्विस प्रोवाइडर बदल सकते हैं।

7-क्या MNP से क्वालिटी सुधरेगी?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह तब ही होगा जब मोबाइल ऑपरेटर्स को लगेगा कि उनके ग्राहक तेजी से खिसक रहे हैं। सर्वे के मुताबिक पॉर्टेबिलिटी से कंपनियों पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला। कुछ ग्राहक उनसे रूठेंगे, तो कुछ जुड़ेंगे भी।

8-क्या ऑपरेटर को बदलने से मोबाइल बिल घटेगा?
मोबाइल कंपनियों का टैरिफ भारत में लगभग एक जैसा ही है। ऑपरेटर बदलने से आपका मोबाइल बिल बहुत कम हो जाएगा, कम से कम ऐसा नहीं होने वाला। हां आप अपने परिवार के बाकी सदस्यों के मोबाइल ऑपरेटर को अपनाकर एक ही नेटवर्क से मिलने वाले फायदे उठा सकते हैं।

9-भविष्य में क्या कुछ फायदा-नुकसान हो सकता है?
पोस्टपेड प्लान सस्ते हो सकते हैं। टेलिकॉम कंपनियां हैंडसेट्स पर डिस्काउंट्स दे सकती हैं।

10-एमएनपी का कंपनियों पर असर?
एमएनपी लागू होने के पहले ही दिन 21 हजार लोगों ने मोबाइल ऑपरेटर बदला।

ऐसे बढ़ाएं अपने लैपटॉप की बैटरी लाइफ


लैपटॉप का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोग उसकी बैटरी लाइफ को लेकर परेशान रहते हैं। लैपटॉप की बैटरी एक बार पूरी तरह चार्ज होने के बाद दो-तीन घंटे तक ही चल पाती है। सफर के दौरान या किसी जरूरी प्रेजेंटेशन के समय अचानक लैपटॉप की बैटरी खत्म हो जाना बड़ी समस्या पैदा कर सकता है, खासकर तब जब आपके आसपास कोई पावर प्लग न हो। कुछ तरीके आजमाकर आप अपने लैपटॉप की बैटरी को ज्यादा समय तक इस्तेमाल करने के अलावा बैटरी को जल्दी खराब होने से भी बचा सकते हैं। पूरी जानकारी नीचे है:-

पावर मैनेजमेंट

पावर मैनेजमेंट को एडजस्ट करके बिजली की खपत को कम-ज्यादा किया जा सकता है। लैपटॉप की स्क्रीन की चमक जितनी ज्यादा होगी, उतनी ही बिजली ज्यादा खर्च होगी। control panel में जाकर power ऑप्शंस के जरिए बैटरी के इस्तेमाल को कम-से-कम पर सेट कर दें। इससे आपकी स्क्रीन की चमक कुछ कम हो जाएगी, प्रोसेसर की स्पीड घटेगी और लैपटॉप इस्तेमाल न होने पर जल्दी-जल्दी स्लीप मोड़ में चला जाएगा। इससे आपके काम पर भी कोई असर नहीं पडे़गा।

हाइबरनेट

काम न करते समय कंप्यूटर को Stand by मोड़ में रखने पर बिजली कम खर्च होती है। लेकिन अगर आपके लैपटॉप में हाइबरनेशन की सुविधा है, तो वह और भी ज्यादा बिजली बचाएगा। इसके लिए control panel में power ऑप्शन्स पर क्लिक करने के बाद खुले डायलॉग बॉक्स में hibernate टैब ढूंढें। अगर यह मौजूद है, तो उसे खोलकर enable hibernate बॉक्स पर टिक करें। अगर हाइबरनेट टैब न दिखे तो आपके लैपटॉप में यह व्यवस्था नहीं है।

पावर लीक

अगर लैपटॉप के साथ फ्लैश ड्राइव, एक्सटर्नल हार्ड डिस्क और स्पीकर, वाई-फाई कार्ड आदि जुड़े हुए हैं, तो उन्हें हटा लें क्योंकि उन सबको जरूरत की बिजली लैपटॉप की बैटरी से ही मिलती है।

सीडी-डीवीडी

लैपटॉप को बैटरी से चलाते समय सीडी और डीवीडी ड्राइव का इस्तेमाल कम-से-कम करें क्योंकि इस प्रोसेस में काफी बिजली खर्च होती है।

बैटरी चार्जिंग

बैटरी को चार्ज करने के बाद लंबे समय तक बिना इस्तेमाल करे न छोड़ें। अगर बैटरी चार्ज की हुई है, तो लैपटॉप को कम-से-कम दो हफ्ते में एक बार जरूर इस्तेमाल करें। अगर लैपटॉप में लीथियन आयन बैटरी है तो उसे पूरी तरह डिस्चार्ज न करें। अगर आपकी बैटरी नॉन लीथियन आयन है तो उसे हर दो-तीन हफ्ते में पूरी तरह से डिस्चार्ज करने के बाद ही दोबारा चार्ज करें। लैपटॉप को लंबे समय तक इस्तेमाल न करने की हालत में नान लीथियन आयन बैटरी को पूरी तरह डिस्चार्ज करके रखें। आपकी बैटरी किस कैटिगरी की है, यह पता करने के लिए लैपटॉप का मैनुअल देखें।

मल्टि-टॉस्किंग

अगर लैपटॉप बैटरी से चल रहा है, तो एक ही समय पर कई ऐप्लिकेशंस का इस्तेमाल न करें। आमतौर पर हम माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस में काम कर रहे होते हैं और साथ में इंटरनेट एक्सप्लोरर पर वेबसाइट्स या ई-मेल भी खुले होते हैं। ऐसा मल्टि-टॉस्किंग के जरिए होता है। लेकिन याद रखें जितना ज्यादा प्रोसेस, उतनी ही ज्यादा बिजली की खपत। एक बार में एक ही सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना बैटरी बचाएगा।

रखें कूल-कूल

लैपटॉप को तेज धूप में या गर्मी वाली दूसरी जगह में न रखें। काम करते समय भी ध्यान रखें कि आपके आसपास का तापमान बहुत ज्यादा न हो क्योंकि वह जितना कम होगा, लैपटॉप उतना ही अच्छा काम करेगा। उसके अंदर हवा जाने के रास्ते बंद न हों, की-बोर्ड में रुकावट न हो इसका ध्यान रखें और समय-समय पर उन्हें साफ करते रहें। तापमान पूछना है।

डिफैग

अगर आपकी हार्ड डिस्क में बहुत ज्यादा फ्रेगमेंटेशन (छितराई हुई फाइलें) है तो प्रोसेसर को फाइल मैनेजमेंट के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और बिजली भी ज्यादा खर्च होती है। इससे बचने के लिए हार्ड डिस्क को डिफ्रैग करते रहें। ऐसा करना बहुत आसान है। सब my computer में जाकर C Drive पर राइट क्लिक करें। अब properties>tools>defragmentation पर जाएं। वहां दिए defragment now बटन को दबाएं। इससे हार्ड डिस्क में डेटा सही तरीके से स्टोर हो जाएगा।

नोट : उसी पावर कॉर्ड (तार) का इस्तेमाल करें जो लैपटॉप के साथ आया है। अगर वह खो गया है तो डीलर या कस्टमर केयर से पूछकर उसका सही रिप्लेसमेंट ढूंढें।

सेक्स नहीं, किस!


भले ही आपको इसका अहसास बाइक शेड के पीछे हुआ हो या फिर कॉलेज के दिनों में किसी डिस्को में, लेकिन सच यही है कि पहला किस पहली बार सेक्स का आनंद लेने से भी ज्यादा याद रहने वाली चीज है।

जी हां, यह निष्कर्ष निकाला है कि यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस के रिसर्चरों ने। इसके लिए उन्होंने किस के बाद मनुष्य के ब्रेन में उठने वाली मैग्नेटिक करंट का विश्लेषण किया। रिसर्चरों का मानना है कि हममें से ज्यादातर लोग किस के एक्सपीरियंस का एक-एक पल 90 पर्सेंट तक अपने दिमाग में सहेज कर रखते हैं।

हालांकि दिलचस्प यह है कि इस मामले में महिला और पुरुषों की सोच अलग-अलग होती है। जी हां, महिलाएं जहां किस को रिलेशनशिप की शुरुआत मान लेती हैं, वहीं पुरुष किस करने के लिए बाद और ज्यादा एग्रेसिव हो जाते हैं। यानी उनकी मंजिल फिर 'कुछ और' हो जाती है।

तो आप कह सकते हैं कि अगर बिग बॉस के घर में अश्मित पटेल ने वीना मलिक के साथ 'कुछ' किया होगा, तो आश्चर्य की बात नहीं! क्योंकि बिग बॉस के दूसरे घरवालों की मानें, तो वीना- अश्मित के बीच किस का एक्सचेंज तो आम सी बात थी।

वैसे, साइंटिस्ट इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे हैं कि मेल एग्रेसिव किसर होते हैं और एक बार शुरू हो गए, तो रुकने का नाम नहीं लेना चाहते हैं। जबकि महिलाएं इसे पसंद नहीं करतीं। महिलाएं स्मॉलर, लेकिन फ्रिक्वेंट किसेज को ही अपने दिमाग में सहेज कर रख पाती हैं। यानी अगर आप पुरुष हैं और चाहते हैं कि कोई महिला आपकी जिंदगी में बनी रहे, तो जेंटल किस का ऑप्शन चूज कीजिए!
इस स्टोरी पर अपनी राय दें।

सेक्स के बाद पुरुषों को होती है 'अजीब बीमारी'



लंदन।।
साइंटिस्ट्स ने दावा किया है कि सेक्स के बाद कई लोग एक अजीब किस्म की बीमारी के शिकार हो जाते हैं। संभवत: उन्हें खुद से एलर्जी हो जाती है।

ब्रिटिश अखबार ' द सन ' की एक खबर के मुताबिक नीदरलैंड के एक ग्रुप ने अध्ययन के आधार पर कहा है कि जिन लोगों में इंटरकोर्स के बाद फ्लू जैसे लक्षण हैं, उन्हें दरअसल अपने स्पर्म को लेकर ही एलर्जी होती है।

ब्रिटेन के अखबार ' द सन ' के अनुसार इस बीमारी में व्यक्ति को इंटरकोर्स के बाद बुखार, नाक बहने, बहुत अधिक थक जाने और आंखों में जलन जैसी परेशानी होती है, जो करीब हफ्तेभर तक रह सकती है।

जाने माने साइंटिस्ट और नीदरलैंड के उट्रेच्ट यूनिवर्सिटी के प्रफेसर मार्सल वाल्डिंगर ने कहा कि संवेदनशीलता खत्म करने वाले विशेष प्रकार के इलाज के माध्यम से इस बीमारी का असर कम किया जा सकता है।

मरीज को एलर्जी वाले पदार्थ से बार-बार आमना सामना कराया जाता है और यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाई जाती है जो कुछ सालों तक चलती है।

आपके कंप्यूटर की IP और अप कहा बैठे है