Tuesday, February 1, 2011

2010 को न ही याद करें तो बेहतर...


ऐसा क्या कुछ रहा साल 2010 में, जिसे आप वाकई याद करना चाहेंगे? जरा सोचिए, क्या थी बीते साल की वो बातें, जो आपके लिए एक सुखद अनुभव हो और उसकी चर्चा करके आप सुकून महसूस कर सकें. यकीनन जवाब 'नहीं' में ही होगा.

सच तो यह है कि हम-आप, हर कोई बीते साल को भूलना ही पसंद करेंगे. एक बुरे, डरावने सपने की तरह... बड़ी उम्मीदें थीं लोगों को इस साल से. बड़े सपने संजोए बैठे थे लोग सरकार से. यूपीए की दूसरी पारी के दूसरे साल में लग रहा था कि सब ठीक हो जायेगा. तमाम मुश्किलें दूर हो जाएंगी और आम आदमी की जिन्दगी पटरी पर बड़े ही आराम से चलेगी, लेकिन हुआ क्या? सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गईं. सारे सपने चकनाचूर हो गए और हम एक निरीह, लाचार की तरह बस देखते रहे.

सबसे ज्यादा कहर तो ढाया महंगाई ने. रॉकेट की तरह चीजों के दाम बढ़ते चले गए. एक के बाद एक चीजें पहले तो रसोई से कम हुईं, फिर धीरे-धीरे गायब ही हो गईं. प्याज ने तो ऐसा रुलाया कि आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. टमाटर को छूने के लिए हाथ तरस गए. दाल तो और भी कमाल की निकली, थाली से बहकर मानो कहीं और चली गई हो. हम रोज जूझते रहे इससे निपटने के लिए, नजरें गडा़ए बैठे रहे रायसीना हिल्स की ओर, लेकिन...

बात यहीं तक रहती, तो कोई और बात होती, लेकिन महंगाई की मार के साथ-साथ घोटालों की मार भी हम पर पड़ने लगी. घोटालेबाजों की लम्बी-चौड़ी फ़ौज हम पर कहर बनकर टूट पड़ी. एक साथ कई तरफ़ से मार हम पर पड़ने लगी. हमारा पैसा नेताओं, अफसरों और दलालों की जेब में जाने लगा. ये करोड़ों-अरबों डकारकर बैठ गए. 2जी स्पेक्ट्रम से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे घोटालों की तो मानो बाढ़ ही आ गई. यही हाल सुरक्षा का भी रहा. अब तो आतंक के साए में हम जीने को मजबूर हो गए हैं.

कोई भी त्योहार हम सुकून से नहीं मना पाते, हर पल आतंकी हमले का साया मंडराते रहता है. बनारस हो या पुणे ब्लास्ट या फिर देश के कई इलाकों में हो रही नक्सली हिंसा. आप घर में हों या सफ़र में, दफ्तर में हों या थियेटर में, कहीं भी नहीं लगा होगा कि हम महफूज हैं. और तो और, हमारे सांसदों ने भी हमारा दिल ही दुखाया. हमारे करोड़ों रुपये हर रोज खर्च हो रहे थे, लेकिन एक दिन भी संसद ढंग से नहीं चली. काम की रत्ती भर भी चर्चा नहीं हुई. पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे में ही निकल गया.

अब आप ही बताएं, आप ऐसे मनहूस साल को याद करना चाहेंगे? मेरा जवाब तो नहीं में है, लेकिन आप अपना जवाब तय कर लें. दुआ कीजिए कि 2011 ऐसा न हो, एक सुखद साल हो हम सबके लिए...2010 से बिलकुल उलट, बिलकुल अलग.

जीवन का सच


एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से पूछा, 'महात्मा जी, ऐसा क्या करें, जिससे जीवन की सभी चिंताओं से मुक्ति मिल जाए और कोई भी काम अधूरा न रहे।' यह सुनकर महात्मा जी मुस्कराए, फिर उन्होंने कहा, 'पहले तुम मुझे कुछ जिंदा मेंढक लाकर दो, उसके बाद तुम्हारे इस सवाल का जवाब दूंगा।' यह सुनकर लोग चकराए।

लेकिन महात्मा जी का आदेश था, सो कुछ लोग जल्दी से तालाब पर पहंुचे और बड़ी मुश्किल से कुछ मेंढक पकड़ लाए। फिर महात्मा जी ने तराजू लाने को कहा। एक आदमी तराजू ले आया। महात्मा जी ने लोगों से कहा कि वे मेंढकों को तौलंे और उनका कुल वजन बताएं। यह कहकर महात्मा जी चले गए। उसी व्यक्ति ने मेंढकों को तौलना शुरू किया जिसने प्रश्न किया था। उसने ज्यों ही मेंढकों को पलड़े पर रखा, कभी एक मेंढक उछलकर भाग निकलता तो कभी दूसरा। फिर लोग उन्हें पकड़कर लाते और तराजू पर रख देते।

लेकिन उन्हें स्थिर रख पाना बेहद कठिन था। लोग दिन भर प्रयास करते रहे। शाम होने पर महात्मा जी फिर वहां पहुंचे। उन्होंने लोगों से यह काम बंद करने को कहा। सारे मंेढक भाग निकले। महात्मा जी ने कहा, 'जैसे इतने जिंदा मेंढकों को खुले तौर पर तौलना संभव नहीं, उसी प्रकार संसार में सब ठीकठाक करके निश्चिंत रहना संभव नहीं है। उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम, इन सद्गुणों को जीवन में धारण करो और अपना दायित्व निभाओ।'

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